About Munshi Premchand in hindi | मुंशी प्रेमचंद जी की जीवनी

Munshi premchand ki kahani

हिन्दी बहुत खुबसूरत भाषाओं मे से एक है। हिन्दी एक ऐसा विषय है जो, हर किसी को अपना लेती है अर्थात, सरल के लिये बहुत सरल और, कठिन के लिये बहुत कठिन बन जाती है। हिन्दी को हर दिन, एक नया रूप, एक नई पहचान देने वाले थे, उसके साहित्यकार उसके लेखक। उन्ही मे से, एक महान छवि थी Munshi premchand की, वे एक ऐसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे, जिसने हिन्दी विषय की काया पलट दी। वे एक ऐसे लेखक थे जो, समय के साथ बदलते गये और, हिन्दी साहित्य को आधुनिक रूप प्रदान किया। Munshi Premchand ने सरल सहज हिन्दी को, ऐसा साहित्य प्रदान किया जिसे लोग, कभी नही भूल सकते । बड़ी कठिन परिस्थियों का सामना करते हुए हिन्दी जैसे, खुबसूरत विषय  मे, अपनी अमिट छाप  छोड़ी. मुंशी प्रेचंद हिन्दी के लेखक ही नही बल्कि, एक महान साहित्यकार, नाटककार, उपन्यासकार जैसी, बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।

Munshi premchand ki kahani
Munshi Premchand
जन्म31 जुलाई, 1880
लमही, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु8 अक्टूबर, 1936
वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
व्यवसायअध्यापक, लेखक, पत्रकार
राष्ट्रीयताभारतीय
अवधि/कालआधुनिक काल
विधाकहानी और उपन्यास
विषयसामाजिक और कृषक-जीवन
साहित्यिक आन्दोलनआदर्शोन्मुख यथार्थवाद (आदर्शवाद व यथार्थवाद)
,अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ
उल्लेखनीय कार्यगोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, सेवासदन, निर्मला और मानसरोवर
इन्हे भी पड़ेमहादेवी वर्मा, जय शंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत
Munshi Premchand

आगे हम Munshi Premchand जी के, सुन्दर व्यक्तित्व और सम्पूर्ण जीवन का वर्णन करेंगे।

  • जीवन परिचय
  • शिक्षा
  • विवाह
  • कार्यशैली
  • प्रमुख रचनाओ के नाम
  • प्रमुख कथन

मुंशी प्रेमचंद जी का जीवन परिचय (Munshi premchand ji ka jeevan parichay)

31 जुलाई 1880 को, बनारस के एक छोटे से गाँव लमही मे, munshi premchand जी का जन्म हुआ था। प्रेमचंद जी एक छोटे और सामान्य परिवार से थे। उनके दादाजी गुर सहाय राय जो कि, पटवारी थे और पिता अजायब राय जो कि, पोस्ट मास्टर थे। बचपन से ही उनका जीवन बहुत ही, संघर्षों से गुजरा था। जब Munshi Premchand जी महज आठ वर्ष की उम्र मे थे तब, एक गंभीर बीमारी मे, उनकी माता जी का देहांत हो गया।

बहुत कम उम्र मे, माताजी के देहांत हो जाने से, प्रेमचंद जी को, बचपन से ही माता-पिता का प्यार नही मिल पाया। सरकारी नौकरी के चलते, पिताजी का तबादला गौरखपुर हुआ और, कुछ समय बाद पिताजी ने दूसरा विवाह कर लिया। सौतेली माता ने कभी प्रेमचंद जी को, पूर्ण रूप से नही अपनाया। उनका बचपन से ही हिन्दी की तरफ, एक अलग ही लगाव था। जिसके लिये उन्होंने स्वयं प्रयास करना प्रारंभ किया, और छोटे-छोटे उपन्यास से इसकी शुरुवात की। अपनी रूचि के अनुसार, छोटे-छोटे उपन्यास पढ़ा करते थे।

पढ़ने की इसी रुचि के साथ उन्होंने, एक पूुस्तकों के थोक व्यापारी के यहा पर, नौकरी करना प्रारंभ कर दिया। जिससे वह अपना पूरा दिन, पुस्तक पढ़ने के अपने इस शौक को भी पूरा करते रहे। munshi premchand जी बहुत ही सरल और सहज स्वभाव के, दयालु प्रवत्ति के थे। कभी किसी से बिना बात बहस नही करते थे, दुसरो की मदद के लिये सदा तत्पर रहते थे। ईश्वर के प्रति अपार श्रध्दा रखते थे। घर की तंगी को दूर करने के लिये, सबसे प्रारंभ मे एक वकील के यहा, पांच रूपये मासिक वेतन पर नौकरी की। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को हर विषय मे पारंगत किया, जिसका फायदा उन्हें आगे जाकर मिला ,एक अच्छी नौकरी के रूप  मे मिला। और एक मिशनरी विद्यालय के प्रधानाचार्य के रूप मे, नियुक्त किये गये। हर तरह का संघर्ष उन्होंने, हँसते – हँसते  किया और अंत मे, 8 अक्टूबर 1936 को अपनी अंतिम सास ली।

मुंशी प्रेमचंद की शिक्षा (Munshi Premchand Education)

प्रेमचंद जी की प्रारम्भिक शिक्षा, सात साल की उम्र से, अपने ही गाँव लमही के, एक छोटे से मदरसा से शुरू हुई थी। मदरसा मे रह कर, उन्होंने हिन्दी के साथ उर्दू व थोडा बहुत अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान प्राप्त किया। ऐसे करते हुए धीरे-धीरे स्वयं के, बल-बूते पर उन्होंने अपनी शिक्षा को आगे बढाया, और आगे स्नातक की पढ़ाई के लिये, बनारस के एक कालेज मे दाखिला लिया। पैसो की तंगी के चलते अपनी पढ़ाई बीच मे ही छोड़नी पड़ी। बड़ी कठिनाईयों से जैसे-तैसे मैट्रिक पास की थी। परन्तु उन्होंने जीवन के किसी पढ़ाव पर हार नही मानी, और 1919 मे फिर से अध्ययन कर B.A. की डिग्री प्राप्त करी।

मुंशी प्रेमचंद का विवाह (Munshi Premchand marriage)

प्रेमचंद जी बचपन से किस्मत की लड़ाई से लड़ रहे थे। कभी परिवार का लाड-प्यार और सुख ठीक से प्राप्त नही हुआ। पुराने रिवाजो के चलते, पिताजी के दबाव मे आकर, बहुत ही कम उम्र मे पन्द्रह वर्ष की उम्र मे उनका विवाह हो गया। प्रेमचंद जी का यह विवाह उनकी मर्जी के बिना, उनसे बिना पूछे एक ऐसी कन्या से हुआ जोकि, स्वभाव में बहुत ही झगड़ालू प्रवति की और, बदसूरत सी थी। पिताजी ने सिर्फ अमीर परिवार की कन्या को देख कर, विवाह कर दिया।

थोड़े समय  मे, पिताजी की भी मूत्यू हो गयी, पूरा भार प्रेचंद जी पर आ गया। एक समय ऐसा आया कि, उनको नौकरी के बाद भी जरूरत के समय अपनी बहुमूल्य वस्तुओ को बेच कर, घर चलाना पड़ा। बहुत कम उम्र मे ग्रहस्थी का पूरा बोझ़ अकेले पर आ गया। उसके चलते  प्रेमचंद की प्रथम पत्नी से, उनकी बिल्कल नही जमती थी जिसके चलते उन्होंने उसे तलाक दे दिया। और कुछ समय गुजर जाने के बाद, अपनी पसंद से दूसरा विवाह, लग-भग  पच्चीस साल की उम्र मे एक विधवा स्तरी से किया। प्रेमंद जी का दूसरा विवाह बहुत ही संपन्न रहा उन्हें इसके बाद, दिनों दिन तरक्की मिलती गई।

मुंशी प्रेमचंद की कार्यशैली

प्रेमचंद जी अपने कार्यों को लेकर, बचपन से ही सक्रीय थे। बहुत कठिनाईयों के बावजूद भी उन्होंने, आखरी समय तक हार नही मानी और अंतिम क्षण तक कुछ ना कुछ करते रहे, और हिन्दी ही नही उर्दू मे भी, अपनी अमूल्य लेखन छोड़ कर गये।

  • लमही गाँव छोड़ देने के बाद, कम से कम चार साल वह कानपुर मे रहे, और वही रह कर एक पत्रिका के संपादक से मुलाकात करी, और कई लेख और कहानियों को प्रकाशित कराया। इस बीच स्वतंत्रता आदोलन के लिये भी कई कविताएँ लिखी।
  • धीरे-धीरे उनकी कहानियों, कविताओं, लेख आदि को लोगो की तरफ से, बहुत सरहाना मिलने लगी। जिसके चलते उनकी पदोन्नति हुई, और गौरखपुर तबादला हो गया। यहा भी लगातार एक के बाद एक प्रकाशन आते रहे, इस बीच उन्होंने महात्मा गाँधी के आदोलनो मे भी, उनका साथ देकर अपनी सक्रीय भागीदारी रखी। उनके कुछ उपन्यास हिन्दी मे तो, कुछ उर्दू मे प्रकाशित हुए।
  • 1921 मे अपनी पल्नी से, सलाह करने के बाद उन्होंने, बनारस आकर सरकारी नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया। और अपनी रुचि के अनुसार लेखन पर ध्यान दिया। एक समय के बाद अपनी लेखन रुचि मे, नया बदलाव लाने के लिये उन्होंने सिनेमा जगत मे, अपनी किस्मत अजमाने पर जोर दिया, और वह मुंबई पहुच गये और,कुछ फिल्मो की स्क्रिपट भी लिखी परन्तु, किस्मत ने साथ नही दिया और वह फ़िल्म पूरीनही बन पाई। जिसे प्रेमंद जी को नुकसानी उठानी पड़ी और, आखिरकार उन्होंने मुंबई छोड़ने का निर्णय लिया और, पुनः बनारस आगये। इस तरह जीवन मे, हर एक प्रयास और मेहनत कर उ्होंने आखरी सास तक प्रयत्न किये।

प्रेमचंद जी की प्रमुख रचनाओ के नाम (Munshi Premchand creations Name)

देखा जाये तो, मुंशी प्रेमचंद जी की सभी रचनाये प्रमुख थी। किसी को भी अलग से, संबोधित नही किया जा सकता। और उन्होंने हर तरह की अनेको रचनाये लिखी थी जो, हम बचपन से हिन्दी मे पढ़ते आ रहे है। ठीक ऐसे ही, उनके कई उपन्यास, नाटक, कविताएँ, कहानियाँ और लेख हिन्दी साहित्य मे दिये गये है। जैसे-गोदान, गबन, कफ़न आदि अनगिनत रचनाये लिखी है।

मुंशी प्रेमचंद द्वारा कथित कथन व अनमोल वचन (Munshi Premchand Quotes in hindi)

वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो, अपनी रचनाओ मे बहुत ही स्पष्ट और कटु भाषाओं का उपयोग करते थे। उन्होंने ऐसे कथन हिन्दी और अन्य भाषाओ मे लिखे थे जोकि, लोगो के लिये प्रेरणा स्त्रोत बन जाते थे। उनमे से कुछ कथन हम नीचे दे रहे है।

खाने और सोने का नाम जीवन नही है ।

जीवन नाम है सदेव आगे बढ़ते रहने की लगन का ||

विपति से बढ़कर…

अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नही खुला ||

धन खोकर यदि हम अपनी आत्मा को पा सके ।

तो कोई महंगा सौदा नही है ||

सिर्फ उसी को अपनी सम्पति समझो जिसे,

तुमने मेहजत से कमाया है |

अन्याय का सहयोग देना,

अन्याय करने समान है ||

आत्मसम्मान की रक्षा करना हमारा सबसे पहला धर्म है ||

क्रोध मे मनुष्य अपनी मन की बात नहीं कहता,

वह केवल दुसरो का दिल दुखाना चाहता है ।

Munshi Premchand ji ki Kahani

hindi bahut khubsoorat bhashaon me se ek hai. hindi ek aisa vishay hai jo, har kisi ko apna leti hai arthaat, saral ke liye bahut saral aur, kathin ke liye bahut kathin ban jaati hai. hindi ko har din, ek naya roop, ek nayi pahachaan dene vaale the, usake sahityakaar usake lekhak. unhi me se, ek mahan chavi thi munshi premchand ki, ve ek aisi pratibhashali vyaktitv ke dhani the, jisane hindi vishay ki kaya hi palat di. ve ek aise lekhak the jo, samay ke saath badalte gaye aur, hindi saahitya ko aadhunik roop pradaan kiya. munshi premchand ne saral sahaj hindi ko, aisa saahitya pradaan kiya jise log, kabhi nahi bhool sakate . badi kathin paristhiyon ka saamna karate hue hindi jaise, khubsoorat vishay me, apani amit chaap chodi. munshi premchand hindi ke lekhak hi nahi balki, ek mahaan saahityakar, natakakar, upanyaasakaar jaisi, bahumukhi pratibha ke dhani the.

aage hum munshi premchand ji ke, sundar vyaktitv aur sampoorn jeevan ka varnan karenge.

  • jeevan parichay
  • shiksha
  • vivaah
  • karyasheli
  • pramukh rachanao ke naam
  • pramukh kathan

munshi premchand ji ka jeevan parichay

31 july 1880 ko, banaaras ke ek chote se gaon lamhi me, premchand ji ka janm hua tha. premchand ji ek chote aur samanya parivaar se the. unake dadaji gur sahaay rai jo ki, patavari the aur pita ajayab rai jo ki, post mastar the. bachapan se hi unaka jeevan bahut hi, sangharshon se gujara tha. jab premchand ji mahaj 8 varsh ki umr me the tab, ek gambhir bimari me, unaki mata ji ka dehant ho gaya.

bahut kam umr me, mataji ke dehant ho jane se, premchand ji ko, bachapan se hi mata-pita ka pyaar nahi mil paya. sarakari naukari ke chalte, pitaji ka tabadala gaurakhapur hua aur, kuch samay baad pitaji ne dusara vivaah kar liya. sauteli mata ne kabhi premchand ji ko, poorn roop se nahi apnaaya. unaka bachapan se hi hindi ki taraf, ek alag hi lagaav tha. jisake liye unhone svayam prayas karana prarambh kiya, aur chote-chote upanyas se isaki shuruvaat ki. apani roochi ke anusar, chote-chote upanyaas padha karate the.

padhane ki isi ruchi ke saath unhonne, ek pustakon ke thok vyaapari ke yaha par, naukari karana prarambh kar diya. jisase ve apana poora din, pustak padhane ke apane is shauk ko bhi pura karate rahe. Munshi premchand ji bahut hi saral aur sahaj swabhaav ke, dayaalu pravati ke the. kabhi kisi se bina baat bahas nahi karate the, dusaro ki madad ke liye sada tatpar rahate the. eshwar ke prati apaar shradha rakhate the. ghar ki tangi ko door karane ke liye, sabase prarambh me ek vakeel ke yaha, paanch roopaye maasik vetan par naukari ki. dheere-dheere unhonne khud ko har vishay me parangat kiya, jisaka faayida unhe aage jaakar mila, ek acchi naukari ke roop me mila. aur ek mishanari vidyalay ke pradhanacharya ke roop me, niyukt kiye gaye. har tarah ka sangharsh unhone, hasate – hasate kiya aur anth me, 8 october 1936 ko apani antim saas li.

munshi premchand ki shiksha (munshi premchand education)

Munshi premchand ji ki praarambhik shiksha, 7 saal ki umr se, apane hi gaun lamhi ke, ek chote se madarasa se shuru hui thi. madarasa me rah kar, unhone hindi ke saath urdu va thoda bahut angreji bhaasha ka bhi gyaan prapt kiya. aise karate hue dheere-dheere swayam ke, bal-bute par unhone apani shiksha ko aage badhaya, aur aage snatak ki padhai ke liye, banaaras ke ek college me daakhila liya. paiso kee tangi ke chalate apani padhai beech me hi chodani padi. badi kathinaiyon se jaise-taise matrix paas ki thi. parantu unhone jeevan ke kisi padhav par haar nahi maani, aur 1919 me phir se adhyayan kar B.A. ki degree praapt kari.

munshi premchand ka vivaah (munshi premchand marriage)

Munshi premchand ji bachpan se kismat ki ladai se lad rahe the. kabhi parivaar ka laad-pyaar aur sukh theek se prapt nahi hua. purane rivaajo ke chalte, pitaji ke dabaav me aakar, bahut hi kam umr me 15 varsh ki umr me unaka vivaah ho gaya. premchand ji ka ye vivaah unaki marji ke bina, unse bina puche ek aisi kanya se hua joki, swabhaav se bahut hi jhagadaloo pravati ki aur badsoorat si thi. pitaji ne sirf ameer parivaar ki kanya ko dekh kar, vivaah kar diya. thode samay me, pitaji ki bhi mritue ho gayi, pura bhaar premchand ji par aa gaya. ek samay aisa aaya ki, unako naukari ke baad bhi jaroorat ke samay apani bahumulya vastuo ko bech kar, ghar chalana pada. bahut kam umr me grahasthi ka poora bojh akele par aa gaya. usake chalate premchand ki pratham patni se, unaki bilkul nahi jamati thi jisake chalate unhone use talaak de diya. aur kuch samay gujar jaane ke baad, apani pasand se dusara vivaah, lag-bhag 25 saal ki umr me ek vidhva stri se kiya. premchand ji ka dusara vivaah bahut hi sampann raha unhen isake baad, dino din tarakki milati gai.

munshi premchand ki kaaryasheli

premchand ji apane kaaryo ko lekar, bachapan se hi sakriya the. bahut kathinaiyo ke baavajood bhi unhone, aakhari samay tak haar nahi manee aur antim samay tak kuch na kuch karate rahe, aur hindi hi nahi urdu me bhi, apani amulya lekhan chod kar gaye.

  • lamhi gaun chod dene ke baad, kam se kam 4 saal ve kanpur me rahe, aur vahi reh kar ek patrika ke sampaadak se mulakaat kari, aur kai lekh aur kahaniyo ko prakashit karaya. is beech swatantrata aandolan ke liye bhi kai kavitaen likhi.
  • dheere-dheere unaki kahaniyon, kavitaon, lekh aadi ko logo ki taraf se, bahut sarhana milane lagi. jisake chalate unaki padonnati huee, aur gorakhapur tabaadla ho gaya. yaha bhi lagataar ek ke baad ek prakashan aate rahe, is beech unhonne mahatma gandhi ke aandolano me bhi, unaka saath dekar apani sakriya bhagidhari rakhi. unake kuchh upanyaas hindi me to, kuch urdu me prakashit hue.
  • 1921 me apani patni se, salaah lene ke baad unhone, banaaras aakar sarkari naukari chodane ka nirnay le liya. aur apani ruchi ke anusaar lekhan par dhyaan diya. ek samay ke baad apani lekhan ruchi me, naya badlaav laane ke liye unhone cinema jagat me, apani kismat aajmaane par jor diya, aur ve mumbai pahuch gaye aur,kuch filmo ki script bhi likhi parantu, kismat ne saath nahi diya aur ve film puri nahi ban pai. jise premchand ji ko nukasani uthani padi aur, aakhirkaar unhone mumbai chodane ka nirnay liya aur, punah banaaras aagaye. is tarah jeevan me, har ek prayaas aur mehanat kar unhone aakhari saas tak prayatn kiye.

Munshi premchand ji ki pramukh rachanao ke naam

dekha jaaye to, munshi premchand ji ki sabhi rachanaaye pramukh thi. kisi ko bhi alag se, sambodhit nahi kiya ja sakata. aur unhone har tarah ki aneko rachanaye likhi thi jo, hum bachapan se hindi me padhate aa rahe hai. thik aise hi, unake kai upanyaas, naatak, kavitaen, kahaniyan aur lekh hindi saahitya me diye gaye hai. jaise – godan, gaban, kafan aadi anginat rachanaye likhi hai

munshi premchand dwara kathit kathan va anmol vachan

ve ek aise vyakti the jo, apani rachanao me bahut hi spasht aur katu bhashaon ka upayog karate the. unhone aise kathan hindi aur anya bhaashao me likhe the joki, logo ke liye prerna strot ban jaate the. unme se kuch kathan hum niche de rahe hai.

khaane aur sone ka naam jeevan nahi hai

jeevan naam hai sadev aage badhate rahane ki lagan ka ||

vipatti se badkar…

anubhav sikhaane vala koi vidyaalay aaj tak nahi khula ||

dhan khokar yadi hum apani aatma ko pa sake

to koi mahanga sauda nahi hai ||

sirph usi ko apani sampati samajho jise,

tumane mehanat se kamaya hai |

anyaay ka sahayog dena, anyaay karane samaan hai ||

aatmsamman ki raksha karana

hamara sabase pehela dharm hai ||

krodh me manushya apani mun ki baat nahi keheta,

vah keval dusaro ka dil dukhaana chahata hai .

Mahadevi Verma ka jeevan parichay | महादेवी वर्मा की जीवनी

Mahadevi verma
mahadevi verma ka jeevan parichay

महादेवी वर्मा का जीवन परिचय | Mahadevi verma ka jeevan parichay

जीवन परिचयMahadevi Verma हिन्दी भाषा की प्रख्यात कैवयित्री हैं और वह आधुनिक हिन्दी कविता में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरीं। वह छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों में से एक है। हिंदी साहित्य में महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा के नाम से भी जानी जाती हैं, उनका जन्म 26 मार्च 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद नामक शहर में हुआ था।

पूरा नाममहादेवी वर्मा
जन्म26 मार्च, 1907
जन्म भूमिफ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश
मृत्यु11 सितम्बर, 1987
मृत्यु स्थानप्रयाग, उत्तर प्रदेश
अभिभावकगोविन्द प्रसाद वर्मा, हेमरानी देवी
पतिडॉ. स्वरूप नरेन वर्मा
कर्म भूमिइलाहाबाद
कर्म-क्षेत्रअध्यापक, लेखिका
मुख्य रचनाएँदीपशिखा, मेरा परिवार, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, शृंखला की कड़ियाँ, अतीत के चलचित्र, नीरजा, नीहार
विषयगीत, रेखाचित्र, संस्मरण व निबंध
भाषाहिन्दी
विद्यालयक्रास्थवेट कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
शिक्षाएम.ए. (संस्कृत)
पुरस्कार-उपाधिसेकसरिया पुरस्कार (1934), द्विवेदी पदक (1942), भारत भारती पुरस्कार (1943), मंगला प्रसाद पुरस्कार (1943) पद्म भूषण (1956), साहित्य अकादेमी फेल्लोशिप (1979), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982), पद्म विभूषण (1988)
नागरिकताभारतीय
विधागद्य और पद्य
अन्य जानकारीस्वाधीनता प्राप्ति के बाद 1952 में महादेवी वर्मा उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या मनोनीत की गईं।
Mahadevi Verma ka jeevan parichay

महादेवी वर्मा का परिवार | Mahadevi Verma Ka parivaar

उनके पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा था जो कि भागलपुर के कॉलेज में प्रधानाचार्य  के पद पर कार्यरत थे। उनकी माता का नाम हेमरानी था जोकि एक कवयित्री थी एवं श्री कृष्ण में अटूट श्रद्धा रखती थी और वे प्रतिदिन कई घंटे पूजा-पाठ करती थी। इसके बिल्कुल विपरीत उनके पिता गोविन्द प्रसाद वर्मा संगीत प्रेमी, नास्तिक, शिकार करने एवं घूमने के शौकीन, मांसाहारी तथा हँसमुख व्यक्ति थे। हिंदी काव्य जगत के दो  सर्वश्रेष्ठ कवियों सुमित्रानंदन पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” को महादेवी वर्मा राखी बांधती थी, Mahadevi verma ने निराला जी को लगभग 40 वर्षों तक राखी बांधी थी।

महादेवी वर्मा की शिक्षा | Mahadevi Verma ki Shiksha

Mahadevi Verma की प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में जबकि उच्च शिक्षा प्रयाग इलाहाबाद में हुई थी। महादेवी वर्मा जी ने आठवीं कक्षा में प्रान्त भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यहीं पर उन्होंने अपने काव्य जीवन की शुरुआत की। 9 वर्ष की छोटी सी अवस्था में ही उनका विवाह स्वरूप नारायण वर्मा से हो गया था किन्तु इन ही दिनों में इनकी माता का स्वर्गवास हो गया और इस विकट स्थिति में भी इन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा और अपना अध्ययन जारी रखा। इसी परिश्रम के फलस्वरूप आपने मैट्रिक से लेकर B.A. तक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की आपने बालिकाओं की शिक्षा के लिए भी काफी प्रयास किए और साथ ही साथ नारी की स्वतंत्रता के लिए भी संघर्ष करती रही आपके जीवन पर राष्ट्रपिता महात्मा गांध्ी का एवं कला साहित्य साधना पर रवींद्रनाथ टैगोर का गहरा प्रभाव पड़ा।

महादेवी वर्मा की मृत्यु | Mahadevi Verma ki mritue

Mahadevi Verma जी का जीवन एक संन्यासिनी का जीवन था । उन्होंने जीवन भर श्वेत वस्त्र पहना, तख्त पर सोईं और कभी शीशा नहीं देखा। सन् 1966 में पति की मृत्यु के बाद वे स्थाई रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं। भावुकता एवं करुणा आपके कार्य की पहचान है और इन्हीं कारणों से आपको आधुनिक युग की मीरा भी कहा जाता है। 11 सितंबर 1987 को महादेवी वर्मा की मृत्यु हो गई।

महादेवी वर्मा की रचनाएं | Mahadevi Verma ki rachnae

  • नीहार
  • रश्मि
  • नीरजा
  • सांध्यगीत
  • दीपशिखा
  • यामा
  • मेरा परिवार
  • अतीत के चलडित्र
  • स्मृति की रेखाये
  • गिल्लू

महादेवी वर्मा जी के पुरस्कार | Mahadevi Verma ji ke puraskar

महादेवी वर्मा के रचनात्मक गुण और तेज़ बुद्धि ने जल्द ही उन्हें हिंदी भाषा की दुनिया में एक उच्च पद पर पहुंचाया। 1934 में, उनके द्वारा रचित “नीरजा” के लिए हिंदी साहित्य सम्मलेन ने उन्हें सेकसरिया पुरस्कार से सम्मानित किया। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 1952 में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या मनोनीत की गयीं। 1956 में भारत सरकार ने उन्हें पदम्भू षण प्रदान किया,और 1979 में उन्हें साहित्य अकादमी अनुदान का पुरस्कार दिया गया। 1988 में, भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पदम्वि भूषण प्रदान किया, जो भारत सरकार का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। आधुनिक गीत काव्य में महादेवी जी का स्थान सर्वोपरि है। महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में संवेदना दृढ़ता और आक्रोश का अदभुत संतुलन मिलता है। वे अध्यापक, कवि, गद्यकार, कलाकार, समाजसेवी और विदुषी के बहुरंगे मिलन का जीता जागता उदाहरण थीं। उनकी काव्य साधना के लिए संपूर्ण हिंदी जगत सदैव उनका आभारी रहेगा।

Mahadevi Verma ka jeevan parichay

jeevan parichay – mahadevi verma hindi bhasha ki prakhyaat kavitri hain aur ve aadhunik hindi kavita mein ek mahatvapurn shakti ke roop mein ubhareen. ve chayavadi yug ke pramukh stambhon mein se ek hai. hindi saahitya mein mahadevi verma aadhunik meera ke naam se bhi jaani jaati hain, unaka janm 26 march 1907 mein uttar pradesh ke farukhabad naamak shahar mein hua tha.

mahadaivi vairm ka parivaar

unake pita ka naam govind prasad verma tha jo ki bhagalapur ke college mein pradhanacharya ke padh par kaaryarat the. unaki mata ka naam hemarani tha joki ek kavitri thi evam shree krishna mein atoot shraddha rakhati thi aur ve pratidin kaee ghante pooja-paath karati thi. isake bilkul vipareet unake pita govind prasad verma sangeet premee, naastik, shikaar karane evam ghoomane ke shaukeen, maansahaari tatha hansamukh vyakti the. hindi kaavya jagat ke do sarvashreshth kaviyon sumitraanandan pant aur suryakant tripati “Nirala” ko mahadevi verma rakhee bandhati thi, mahadevi verma ne Nirala ji ko lagabhag 40 varsho tak rakhee bandhi thi.

mahadevi verma ki shiksha

mahadevi verma ki prarambhik shiksha indore mein jabaki ucchh shiksha prayaag allahabad mein hui thi. mahadevi verma ji ne 8 vi kaksha mein praant bhar mein pratham sthaan praapt kiya. yaheen par unhonne apane kaavya jeevan ki shuruat ki. 9 varsh ki choti si avastha mein hi unaka vivaah swarup narayan verma se ho gaya tha kintu in hi dino mein inki mata ka swargvas ho gaya aur is vikat sthiti mein bhi inhone dhairya nahi choda aur apana adhyayan jaari rakha. isi parishram ke phalswarup aapane metrix se lekar B.A. tak ki pariksha pratham shreni mein uttirn ki aapane baalikaon ki shiksha ke lie bhi kaafi prayaas kiya aur saath hi saath naari ki swatantrata ke liye bhi sangharsh karati rahi aapake jeevan par rashtrapita mahatma gandhi ka evam kala saahitya sadhana par rabindranath tagore ka gahara prabhav pada.

mahadevi verma ki mrityu

mahadevi verma ji ka jeevan ek sanyasini ka jeevan tha . unhone jeevan bhar shwet vastra pahane , takht par soi aur kabhi sheesha nahin dekha. sun 1966 mein pati ki mrityu ke baad ve sthai roop se allahabad mein rahane lagi. bhavukata evam karuna aapake kaarya ki pahachaan hai aur inhi kaarano se aapako aadhunik yug ki meera bhi kaha jaata hai. 11 september 1987 ko mahadevi verma ki mrtyu ho gaee.

mahadevi verma ki rachanaen

  • nihaar
  • rashmi
  • neeraj
  • sandhyageet
  • deepashikha
  • yaama
  • mera parivar
  • ateet ke chalchitra
  • smruti ki rekhaye
  • gillu

mahadevi verma ji ke puraskar

mahadevi verma ke rachnaatmak gun aur tez buddhi ne jald hee unhe hindi bhasha ki duniya mein ek uchch pad par pahunchaaya. 1934 mein, unake dwara rachit “Neeraj” ke liye hindi saahitya sammelan ne unhe sekasariya puraskaar se sammanit kiya. swadhinata praapti ke baad 1952 mein ve uttar pradesh vidhaan parishad ki sadasya manoneet ki gayee. 1956 mein bhaarat sarakar ne unhe padmabhoo shan pradaan kiya, aur 1979 mein unhen saahitya academy anudaan ka puraskaar diya gaya. 1988 mein, bharat sarakar ne unhe maranoparant padamvi bhooshan pradaan kiya, jo bharat sarakar ka doosara sarvochch naagarik samman hai. aadhunik geet kaavya mein mahadevi ji ka sthan sarvopari hai. mahadevi verma ke vyaktitv mein sanvedana dridata aur aakrosh ka adabhut santulan milata hai. ve adhyaapak, kavi, gadyakaar, kalaakar, samajsevi aur vidushi ke bahurange milan ka jeeta jaagata udaaharan thi. unaki kaavya saadhana ke lie sampoorn hindi jagat sadaiv unka aabhaari rahega.

Jaishankar Prasad ji ka jeevan parichay | जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचाय

Jaishankar prasad in hindi
jai shankar prasad
पूरा नाममहाकवि जयशंकर प्रसाद
जन्म30 जनवरी, 1889 ई.
जन्म भूमिवाराणसी, उत्तर प्रदेश
मृत्यु15 नवम्बर, सन् 1937 (आयु- 48 वर्ष)
मृत्यु स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
अभिभावकदेवीप्रसाद साहु
कर्म भूमिवाराणसी
कर्म-क्षेत्रउपन्यासकार, नाटककार, कवि
मुख्य रचनाएँचित्राधार, कामायनी, आँसू, लहर, झरना, एक घूँट, विशाख, अजातशत्रु, आकाशदीप, आँधी, ध्रुवस्वामिनी, तितली और कंकाल
विषयकविता, उपन्यास, नाटक और निबन्ध
भाषाहिंदी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली
नागरिकताभारतीय
शैलीवर्णनात्मक, भावात्मक, आलंकारिक, सूक्तिपरक, प्रतीकात्मक
इन्हें भी देखेंमहादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत
Jaishankar Prasad

Jaishankar Prasad ka jivan parichay – जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचाय

जयशंकर प्रसाद (jaishankar prasad) – सन् 1889-1937 ई.

Jaishankar prasad ji का जन्म काशी के एक सुप्रसिद्ध वैश्य परिवार में 30 जनवरी सन् 1889 ई. में हुआ था। काशी में इनका परिवार सुँघनी साहू के नाम से प्रसिद्ध था। इसका कारण यह था कि इनके यहाँ तम्बाकू का व्यापार होता था। Jaishankar prasad ji के पितामह का नाम शिवरत्न साहू और पिता का नाम देवीप्रसाद था। प्रसाद जी के पितामह शिव के परम भक्त और दयालु थे। इनके पिता भी अत्यधिक उदार और साहित्य-प्रेमी थे।

Jaishankar prasad ji का बाल्यकाल सुख के साथ व्यतीत हुआ। इन्होंने बाल्यावस्था में ही अपनी माता के साथ धाराक्षेत्र, ओंकारेश्वर, पुष्कर, उज्जैन और ब्रज आदि तीर्थों की यात्रा की। अमरकण्टक पर्वत श्रेणियों के बीच , नर्मदा में नाव के द्वारा भी इन्होंने यात्रा की। यात्रा से लौटने के पश्चात् Jaishankar prasad ji के पिता का स्वर्गवास हो गया। पिता की मृत्यु के चार वर्ष पश्चात् इनकी माता भी इन्हें संसार में अकेला छोड़कर चल बसीं।

प्रसाद जी के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध उनके बड़े भाई शर्भूरत्न जी ने किया। सर्वप्रथम प्रसाद जी का नाम क्वीन्स कॉलेज में लिखवाया गया, लेकिन स्कूल की पढ़ाई में इनका मन न लगा, इसलिए इनकी शिक्षा का प्रबन्ध घर पर ही किया गया। घर पर ही वे योग्य शिक्षकों से अंग्रेजी और संस्कृत का अध्ययन करने लगे। प्रसाद जी को प्रारंभ से ही साहित्य के प्रति अनुराग था। वे प्रायः साहित्यिक पुस्तकें पढ़ा करते थे और अवसर मिलने पर कविता भी किया करते थे। पहले तो इनके भाई इनकी काव्य-रचना में बाधा डालते रहे, परन्तु जब इन्होंने देखा कि प्रसाद जी का मन काव्य-रचना में अधिक लगता है, तब इन्होंने इसकी पूरी स्वतंत्रता इन्हें दे दी।

प्रसाद जी के हृदय को गहरा आघात लगा। इनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई तथा व्यापार भी समाप्त हो गया। पिता जी ने सम्पति बेच दी। इससे ऋण के भार से इन्हें मुक्ति भी मिल गई। परन्तु इनका जीवन संघर्षों और झंझावातों में ही चक्कर खाता रहा यद्यपि प्रसाद जी बड़े संयमी थे, किन्तु संघर्ष और चिन्ताओं के कारण इनका स्वास्थ्य खराब हो गया। इन्हें यक्ष्मा रोग ने धर दबोचा। इस रोग से मुक्ति पाने के लिए इन्होंने पूरी कोशिश की, किन्तु सन् 1937 ई. की 15 नवम्बर को रोग ने इनके शरीर पर अपना पूर्ण अधिकार कर लिया और वे सदा के लिए इस संसार से विदा हो गए।

जयशंकर प्रसाद जी की प्रमुख कृतियाँ (Jai Shankar Prasad ji ki pramukh krutiyan)

कृतियाँ –

  • काव्य- ऑसू, कामायनी, चित्राधर, लहर, झरना
  • कहानी- ऑँधी, इन्द्रजाल , छाया, प्रतिध्वनि (प्रसाद जी अंतिम काहनी सालवती है । )
  • उपन्यास- तितली, कंकाल इरावती
  • नाटक- सज्जन, कल्याणी-परिणय, चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, प्रायश्चित, जनमेजय का नाग यज्ञ, विशाख, धुवस्वामिनी
  • निबन्ध- काव्यकला एवं अन्य निबन्ध

Jai Shankar Prasad Ji ki भाषा-शैली

जिस प्रकार Jaishankar prasad ji के साहित्य में बिविधता है। उसी प्रकार उनकी भाषा ने भी कई स्वरूप धारण किए है। इनकी भाषा का स्वरूप बिषयों के अनुसार ही गठित हुआ है। प्रसाद जी ने अपनी भाषा का श्रृंगार संस्कृत के तत्सम शब्दों से किया है। भावमयता इनकी भाषा शैली प्रधान विशेषता है। भावों ओर बिचारों के अनिल शब्द इनकी भाषा में सहज रूप से आ गए है। प्रसाद जी की भाषा में मुहाबरों और लोकोक्तियों के प्रयोग नहीं के बराबर है। बिदेशी शब्दों के प्रयोग भी इनकी भाषा में नहीं मिलते।

शैलीप्रसाद जी की शैली को पाँच भागों में विभक्त है

  • विचारात्मक शैली
  • इतिवृत्तात्मक शैली
  • चित्रात्मक शैली
  • अनुसन्धानात्मक शैली
  • भावात्मक शैली

हिन्दी साहित्य में स्थान

बॉग्ला-साहित्य में जो स्थान रवीनद्रनाथ ठाकुर का ओर रूसी-साहित्य में जो स्थान तुर्गनेव का है, हिन्दी साहित्य में वही स्थान प्रसाद जी का है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर और तुर्गनेव की भाँति प्रसाद जी ने साहित्य के विभिनन क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। प्रसाद जी कवि भी थे और नाटककार भी, उपन्यासकार भी थे और कहानीकार भी। इसमें सन्देह नहीं कि जब तक हिन्दी – साहित्य का अस्तित्व रहेगा. प्रसाद जी के नाम को विस्मृत किया जाना संभव नहीं हो सकेगा।

Jaishankar Prasad ka jivan parichay

jaishankar prasad ji ka janm kashi ke ek suprasidh veshya parivaar mein 30 january sun 1889 ee mein hua tha. kashi mein inka parivaar sunghani saahoo ke naam se prasidh tha. iska karan ye tha ki inke yahaan tambaakoo ka vyapaar hota tha. jaishankar prasad ji ke pitamah ka naam shivaratn saahoo aur pita ka naam deviprasad tha. prasad ji ke pitamah shiv ke param bhakt aur dayalu the. inke pita bhi atyadhik udaar aur saahity-premee the.

jaishankar prasad ji ka balya kaal sukh ke saath vyateet hua. inhonne balyavastha mein hi apanee mata ke saath dharakshetra, omkareshwar, pushkar, ujjain aur braj adi tirtho ki yaatra kee. amarakantak parvat shreniyon ke beech , narmada mein naav ke dvaara bhee inhonne yaatra kee. yaatra se lautane ke pashchaat jai shankar prasad ji ke pita ka swargvas ho gaya. pita ki mrityu ke chaar varsh pashchaat inki mata bhi inhe sansaar mein akela chodakar chal basee.

prasad ji ke palan-poshan aur shiksha-deeksha ka prabandh unake bade bhai sharbhuratn ji ne kiya. sarvapratham prasad ji ka naam queens college mein likhavaya gaya, lekin school ki padhai mein inaka mun na laga, isalie inaki shiksha ka prabandh ghar par hi kiya gaya. ghar par hi ve yogya shikshako se angreji aur sanskrit ka adhyayan karane lage. prasad ji ko prarambh se hi saahitya ke prati anuraag tha. ve prayah sahityik pustaken padha karate the aur avasar milane par kavita bhi kiya karate the. pahale to inake bhai inaki kaavya-rachana mein badha dalate rahe, parantu jab inhone dekha ki prasad ji ka mun kaavya-rachana mein adhik lagata hai, tab inhonne isaki poori swatantrata inhe de di.

jaishankar prasad ji ke hriday ko gahara aaghat laga. inki aarthik sthiti bigad gai tatha vyapaar bhi samapt ho gaya. pita ji ne sampati bech di. isase rin ke bhaar se inhe mukti bhi mil gaee. parantu inka jeevan sangharshon aur jhanjhavaaton mein hi chakkar khaata raha yadyapi prasad ji bade sanyami the, kintu sangharsh aur chintaon ke kaaran inka swaasth kharab ho gaya. inhen yakshma rog ne dhar dabocha. is rog se mukti paane ke lie inhone puri koshish ki, kintu sun 1937 ee ki 15 november ko rog ne inake shareer par apana poorn adhikaar kar liya aur ve sada ke lie is sansaar se vida ho gae.

jai shankar prasad ji ki pramukh krutiyan

krtiyaan

  • kaavy- aasun, kamayni, chitradhar, lahar, jharana
  • kahani – aandhi, indrajaal , chhaaya, pratidhvani (prasad ji antim kahani salavati hai . )
  • upanyaas – titali, kankaal iraavati
  • naatak- sajjan, kalyani – parinay, chandragupt, skandagupt, ajaatshatru, prayashchit, janamejay ka naag yagy, vishaakh, dhuvaswaamini
  • nibandh- kaavyakala evam anya nibandh

jai shankar prasad ji ki bhasha-sheli

jis prakaar jaishankar prasad ji ke saahitya mein vividhata hai. usee prakaar unaki bhaasha ne bhi kaee swarup dhaaran kie hai. inki bhasha ka swarup bishayon ke anusaar hi gathit hua hai. prasad ji ne apanee bhasha ka shringaar sanskrit ke tatsam shabdo se kiya hai. bhaavamayata inki bhasha sheli pradhan visheshata hai. bhaavon or vichaaron ke anil shabd inki bhasha mein sahaj roop se aa gae hai. prasad ji ki bhasha mein muhavaron aur lokoktiyon ke prayog nahin ke baraabar hai. videshi shabdo ke prayog bhi inki bhasha mein nahin milate.

sheli – prasad ji ki sheli paanch bhaago mein vibhakt hai

  • vichaaraatmak sheli
  • itivrttaatmak sheli
  • chitraatmak sheli
  • anusandhaanaatmak sheli
  • bhaavaatmak sheli

hindi saahitya mein sthaan

bogla-saahitya mein jo sthaan rabindranath tagore ka or rusi-saahitya mein jo sthaan turganev ka hai, hindi saahitya mein vahi sthaan prasad ji ka hai. rabindranath tagore aur turganev ki bhaanti prasad ji ne saahitya ke vibhinan kshetron mein apani pratibha ka pradarshan kiya hai. prasad ji kavi bhi the aur naatak kaar bhi, upanyaaskaar bhi the aur kahaanikar bhi. isame sandeh nahin ki jab tak hindi – saahitya ka astitv rahega. prasad ji ke naam ko vismrit kiya jaana sambhav nahin ho sakega.

सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan pant in hindi

Sumitranandan pant, sumitra nandan pant, sumitra nandan panth
Sumitranandan Pant

Sumitranandan Pant

पूरा नामसुमित्रानंदन पंत
अन्य नामगुसाईं दत्त
जन्म20 मई 1900
जन्म भूमिकौसानी, उत्तराखण्ड, भारत
मृत्यु28 दिसंबर, 1977
मृत्यु स्थानइलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत
कर्म भूमिइलाहाबाद
कर्म-क्षेत्रअध्यापक, लेखक, कवि
मुख्य रचनाएँवीणा, पल्लव, चिदंबरा, युगवाणी, लोकायतन, युगपथ, स्वर्णकिरण, कला और बूढ़ा चाँद आदि
विषयगीत, कविताएँ
भाषाहिन्दी
विद्यालयजयनारायण हाईस्कूल, म्योर सेंट्रल कॉलेज
पुरस्कार-उपाधिज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार , ‘लोकायतन’ पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार
नागरिकताभारतीय
आंदोलनरहस्यवाद व प्रगतिवाद
Sumitranandan Panth

सुमित्रानंदन पन्त का जीवन परिचय (Sumitranandan Pant ka jeevan parichay)

हिंदी साहित्य का भारतीय इतिहास में अमूल्य योगदान रहा हैं। भारत भूमि पर ऐसे कई लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अपनीकलम की ताकत से समाज सुधार के कार्य किये। जैसे जयशंकरप्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’ आदि। आज हमआपको हिंदी भाषा के ऐसे ही कवि सुमित्रानंदन पन्त के बारे मेंबताने जा रहे हैं जिनके बिना हिंदी साहित्य की कल्पना ही नहीं कीजा सकती हैं।

सुमित्रानंदन पन्त का जन्म (Sumitra nandan pant ka janam)

सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म 20 मई 1900 को अल्मोड़ा जिले केकौसानी नामक गांव में हुआ था। जो कि उत्तराखंड में स्थित हैं। इनके पिताजी का नाम गंगा दत्त पन्त और माताजी का नाम सरस्वती देवी था। जन्म के कुछ ही समय बाद इनकी माताजी का निधन हो गया था। पन्तजी का पालन-पोषण उनकी दादीजी ने किया। पन्त सात भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। बचपन में इनकानाम गोसाई दत्त रखा था। पन्त को यह नाम पसंद नहीं था इसलिए इन्होने अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पन्त रख लिया। सिर्फ 7 साल की उम्र में ही पन्त ने कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था।

सुमित्रानंदन पन्त की शिक्षा और प्रारंभिक जीवन (Sumitra nandan panth ki shiksha or prarambik jeevan)

पन्त ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा से पूरी की। हाई स्कूल की पढाई के लिए 18 वर्ष की उम्र में अपने भाई के पास बनारस चलेगए। हाई स्कूल की पढाई पूरी करने के बाद पन्त इलाहाबाद चले गए और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में स्नातक की पढाई के लिए दाखिला लिया। सत्याग्रह आन्दोलन के समय पन्त अपनी पढाई बीच में ही छोड़कर महात्मा गाँधी का साथ देने के लिए आन्दोलनमें चले गए। पन्त फिर कभी अपनी पढाई जारी नही कर सके परंतु घर पर ही उन्होंने हिंदी, संस्कृत और बंगाली साहित्य का अध्ययनजारी रखा। 1918 के आस-पास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। वर्ष 1926-27 में पंतजी के प्रसिद्ध काव्य संकलन “पल्लव” का प्रकाशन हुआ। जिसके गीत सौन्दर्यता और पवित्रता का साक्षात्कार करते हैं। कुछ समय बाद वे अल्मोड़ाआ गए। जहाँ वे मार्क्स और फ्राइड की विचारधारा से प्रभावित हए थे। वर्ष 1938 में पंतजी “रूपाभ” नाम का एक मासिक पत्र शुरूकिया। वर्ष 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुड़े रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया।

सुमित्रानंदन पन्त की काव्य कृतियाँ (Sumitranandan pant ka kavya krutiyan)

सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं – ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि हैं। उनके जीवनकाल में उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुई। जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। पंत अपने विस्तृत समय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं “पल्लव” में संकलित हैं, जो 1918 से 1924 तक लिखी गई 32 कविताओं का संग्रह है। – Sumitranandan pant

सुमित्रानंदन पन्त के पुरुस्कार और उपलब्धियाँ (Sumitra nandan pant ke puraskaar or uplabdiyan)

अपने सहित्यिक सेवा के लिए पन्त जी को पद्मभूषण (1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरूपुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। पन्त जी कौशानी में बचपन में जिस घर में रहते थे, उस घर को सुमित्रानंदन पन्त वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया हैं। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है। संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष पंत व्याख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से ‘सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम सुमित्रा नंदन पंतउद्यान कर दिया गया है।

sumitranandan pant, sumitra nandan pant, sumitra nandan panth
sumitranandan panth musium

सुमित्रानंदन पन्त की मृत्यु (Sumitranandan pant ki mrutue)

28 दिसम्बर 1977 को हिंदी साहित्य का प्रकाशपुंज संगम नगरी इलाहाबाद में हमेशा के लिए बुझ गया। सुमित्रानंदन पन्त को आधुनिक हिंदी साहित्य का युग प्रवर्तक कवि माना जाता हैं।

Hinglish bhasha me Sumitranandan Pant ka jeevan parichay

sumitraanandan pant ka jeevan parichay

hindi saahitya ka bharatia itihaas mein amooly yogdaan raha hain. bharat bhoomi par aise kaee lekhak aur kavi hue hain jinhone apanee kalam ki taakat se samaaj sudhaar ke kaarya kiye. jaise jayshankar prasad, mahadevi verma, suryakant tripati “NIRALA” adi. aaj hum aapako hindi bhasha ke aise hi kavi sumitranandan pant ke bare me batane ja rahe hain jinke bina hindi sahitya ki kalpana hi nahi ki ja sakati hain.

sumitranandan pant ka janm

sumitranandan pant ka janm 20 may 1900 ko almoda jile ke kausani naamak gaaun mein hua tha. jo ki uttarakhand mein sthit hain. inake pitaji ka naam ganga datt pant aur mataji ka naam saraswati devi tha. janm ke kuchh hi samay baad inaki mataji ka nidhan ho gaya tha. pantji ka paalan-poshan unaki dadiji ne kiya. pant 7 bhai-bahano mein sabase chote the. bachapan mein inka naam gosai datt rakha tha. pant ko ye naam pasand nahi tha isilie inhone apana naam badalakar sumitranandan pant rakh liya. sirf 7 saal ki umr mein hi pant ne kavita likhna prarambh kar diya tha.

sumitranandan pant ki shiksha aur prarambhik jeevan

pant ne apani prarambhik shiksha almoda se puri ki. high school ki padhai ke lie 18 varsh ki umr mein apane bhai ke paas banaras chale gae. high school ki padhai puri karane ke baad pant alahabad chale gae aur alahabad university mein snatak kee padhai ke lie dakhila liya. satyagrah aandolan ke samay pant apani padhai beech mein hee chodakar mahatma gandhi ka saath dene ke lie aandolan men chale gae. pant phir kabhi apani padhaee jaari nahee kar sake parantu ghar par hee unhone hindi, sanskrit aur bangaali sahitya ka adhyayan jaari rakha. 1918 ke aas-paas tak ve hindi ke naveen dhaara ke pravartak kavi ke roop mein pahachaane jaane lage the. varsh 1926-27 mein pantji ke prasidh kaavy sankalan “pallav” ka prakashan hua. jisake geet saundaryata aur pavitrata ka saakshaatkaar karate hain. kuch samay baad ve almoda gae. jahaan ve marx aur fried ki vichaardhaara se prabhavit hue the. varsh 1938 mein pantji “rupabh” naam ka ek masik patr shuru kiya. varsh 1955 se 1962 tak aakashvani se jude rahe aur mukhya-nirmata ke padh par karya kiya.

sumitranandan pant ki kavya krutiya

sumitranandan pant ki kuch anya kavy krutiyan hain

  • granthi
  • gunjan
  • graamya
  • yugaant
  • svarnakiran
  • svarnadhooli
  • kala aur boodha chaand
  • lokaayatan
  • chidambara
  • satyakaam

unake jeevan kaal mein unaki 28 pustaken prakashit hui. jinamen kavitaen, padya-naatak aur nibandh shamil hain. pant apane vistrut samay mein ek vichaarak, daarshanik aur manavta vadi ke rup mein samane aate hain kintu unaki sabase kalaatmak kavitaen “pallav” mein sankalit hain, jo 1918 se 1924 tak likhee gaee 32 kavitaon ka sangrah hai.

sumitranandan pant ke puraskar aur uplabdhiyaan

apane sahityik seva ke lie pant ji ko padmabhushan (1961), gyanpith(1968), sahitya academy, tatha soviyat land neharupuraskaar jaise uchch shreni ke sammano se alankrit kiya gaya. pant ji kaushani mein bachapan mein jis ghar mein rahate the, us ghar ko sumitranandan pant vithika ke naam se ek sangrahalay ke rup mein parivartit kar diya gaya hain. isamen unake vyaktigat prayog ki vastuon jaise kapado, kavitaon kee mool pandulipiyon, chaayachitron, patron aur puraskaron ko pradarshit kiya gaya hai. isamen ek pustakalay bhi hai, jisamen unaki vyaktigat tatha unase sambandit pustakon ka sangrah hai. sangrahalay mein unaki smruti mein pratyek varsh pant vyakhyamala ka aayojan hota hai. yahaan se sumitranandan pant vyaktitv aur krutitv namak pustak bhi prakashit ki gai hai. unake naam par allahaabad shahar mein sthit hathi park ka naam sumitra nandan pant udyaan kar diya gaya hai.

sumitranandan pant ki mrityu

28 december 1977 ko hindi sahitya ka prakashapunj sangam nagari allahabad mein hamesha ke lie bujh gaya. sumitranandan pant ko aadhunik hindi sahitya ka yug pravartak kavi maana jaata hain.